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'हम इजहार करने में थोड़े ढीले हो गए, इस बीच उनके हाथ पीले हो गए', नये साल के मौके पर आयोजित हुआ भव्य कवि सम्मेलन
 

कायमगंज / फर्रुखाबाद।  साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था अनुगूंज के तत्वावधान में नव वर्ष अभिनंदन काव्य गोष्ठी का आयोजन एजुकेयर इंस्टिट्यूट में संपन्न हुआ। जिसकी अध्यक्षता प्रोफेसर रामबाबू मिश्र और संचालन प्रोफेसर कुलदीप आर्य ने किया गोष्ठी में कवियों ने समसामयिक प्रश्नों पर काव्य पाठ करते हुए राष्ट्र एवं समाज को  समृद्ध बनाने का संकल्प लिया। रामबाबू मिश्र रत्नेश ने कहा कि
 अब तो ज्वालामुखी फटेगा सिंध बलूचिस्तान से
 हिंद देश अब यहीं रहेगा सेना और जवान से ,

प्रख्यात गीतकार पवन बाथम ने श्रोताओं की मांग पर एक गजल प्रस्तुत की -
मौत कतराती है ,अब इसलिए मुझसे शायद ।
जान हर वक्त ही अब तेरे पास रहती है॥ 

प्रोफेसर कुलदीप आर्य ने कहा वह तीखे तजुर्बे न फिर बयां हो ,दुआ है मेरी, तुम्हें कोई कमी ना हो ॥ व्यंगकार डॉ० सुनीत सिद्धार्थ ने चुनाव के माहौल को देखते हुए कहा - मीडिया के निष्पक्षता के मापदंड आने लगे हैं , शायर अब्दुल वहाब बाहर ने कहा , दसियों बार इसे समझाया लेकिन यह दिल बाज न आया, कहने को तो सब अपने हैं वक्त पर कोई काम न आया॥

सौरभ गुप्ता साहिल ने पढ़ा - मेरे हौसले से बढ़कर नहीं पथरीली तेरे रास्ते, ए- मंजिल हम तुझे पाके ही रहेंगे॥   हास्य व्यंग के साथ- मनीष गौड़ ने कहा कि- हम इजहार करने में थोड़े ढीले हो गए, इस बीच उनके हाथ पीले हो गए।
 
अमन तस्लीम अंसारी ने  गजल के माध्यम से पढा कि-  जिंदगी के जख्मों की दवा होनी चाहिए, अब लगता है कि मां होनी चाहिए॥ रवि शरण अग्रवाल ने अपनी रचना में कहा- क्यों संजोते हो हृदय में स्वप्न परिचित प्रीत प्रतिमा ।
क्यों रहे कर तुम व्यथित से मिलन क्षण की पूर्व गणना ॥

नितिन गौड़ ने समसामयिक रचनाओं से समा बांधा। राष्ट्रगान के बाद आयोजन का समापन फिर मिलने की उम्मीद के साथ कर दिया गया।


रिपोर्ट जयपाल सिंह यादव दानिश खान

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