आज-कल हमारे सांस्कृतिक त्यौहारों के दिन आ गए है ! इन सांस्कृतिक उत्सवों में हर धार्मिक विधि-विधान और अनुष्ठान में रोली और हल्दी-कुंकुम से ‘स्वस्तिक’ बनाया जाता है ! इसकी क्या महत्ता है, इसे सही तरह से बनाने की विधि क्या है, जो बहुत से लोगों को पता होगी, लेकिन बहुत से साथी अनभिज्ञ भी होगे, सो, आज इस सब के बारे में जानते है !

‘स्वास्तिक’ भारत में सभी शुभ कार्यों में प्रयुक्त होने वाला सौभाग्य और मंगल का प्रतीक है जो ‘सु’ उपसर्ग और ‘अस्’ धातु के मूल शब्दों से मिलकर बना है ! सु यानी ‘सुन्दर’, ‘शुभ’ और ‘अस्’ अर्थात ‘है, होना’ ! यानी यह शब्द सुख-सौभाग्य, समृद्धि, सम्पन्नता का वाहक है ! शास्त्रों में ‘स्वस्ति’ के लिए कहा गया है – ‘स्वस्ति क्षेम कायति इति स्वस्तिक:’ अर्थात्
‘जो कुशल क्षेम और कल्याण प्रदान करे – वह स्वस्तिक है’

देवताओं के साथ भी स्वास्तिक को जोड़ा जाता है ! जैसे, इसे गणेश जी का प्रतीक माना जाता है। इसके दोनों ओर दो खड़ी रेखाएं खींची जाती हैं, जो रिद्धि और सिद्धि के प्रतीक के रूप में मंगलकारी मानी जाती हैं। इससे सदा घडी की सुई की तरह बाएँ से दाएँ ओर का ध्यान रखते हुए अंकित किया जाता है ! स्वस्तिक मुख्यत: सत्य और शक्ति का संयोजन माना गया है। सत्य और शक्ति दोनों ही एक दूसरे के पूरक है, अन्योन्याश्रित हैं । इसकी खड़ी रेखा शक्ति का प्रतीक मानी जाती है तो, आड़ी रेखा सत्य का ! शास्त्रों में शिव को सत्य और पार्वती जी को शक्ति स्वरूपा माना गया है। इस तरह यह गणेश के साथ-साथ शिव और पार्वती का प्रतीक चिह्न भी है।

पुराणों में भी है वर्णन

स्वास्तिक को पुराणों में भगवान विष्णु का सुदर्शन-चक्र माना गया है। ऋग्वेद में स्वस्तिक को मार्तण्ड का प्रतीक माना गया है और इस की चार रेखाओं को मार्तण्ड के तेज को चारों ओर फैलाने वाला कहा गया है। इसके अतिरिक्त स्वस्तिक पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण की ओर मुँह किए अपनी चार भुजाओं से, चार मुख्य दिशाओं की मांगलिक ऊर्जा को प्रदर्शित करती हैं ! मतलब कि इस चिन्ह में समस्त देवो का वास है ! ऋग्वेद मे, स्वस्ति वचन में कहा गया है –

’स्वस्ति न: इंद्रो वृद्धश्रवा: – पहली भुजा इंद्र को समर्पित है।
’स्वस्ति न: पूषा विश्व वेदा: – यानी दूसरी भुजा वेदो को समर्पित है।
’स्वस्ति नस्ताक्ष्र्यो अरिष्ट नेमि: – तीसरी भुजा आपदाओं से मुक्ति के लिये है।
’स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु – चौथी भुजा गुरु बृहस्पति को समर्पित है।

व्यापार में भी है सहायक

व्यापारी इस शुभ चिह्न् का प्रयोग करते हैं अपने बहीखाते व कार्यालय में विशेष रूप से करते हैं । हमारे शास्त्रों में स्वस्तिक को समूचे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना गया है। इसके मध्य में भगवान विष्णु का वास माना गया है, जिस पर सजे कमल को अपना आसान बना कर, ब्रह्मा जी ने चार मुख और चार हाथों से चार वेदों का सृजन किया था। इतना हीनहीं, स्वस्तिक को चतु:वर्ण, चतु:आश्रम और चतु: युग, के प्रतीक रूप में भी व्याख्यायित किया गया है ! यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का परिचायक भी बताया गया है। अमरकोश नामक में ‘स्वस्तिक सर्वतो ऋद्ध’ लिखा गया है अर्थात स्वस्तिक चिह्न का सृजन इसी भावना से किया गया है कि सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।

ऐसी आस्था है कि ‘स्वस्तिक’ को घर के द्वार पर बनाने से घर में सब शुभ और मंगल होता तथा नकारात्मकता दूर होती है ! इस तरह ‘स्वस्तिक’ सब तरह का शुभ करने वाला, मंगल बरसाने वाला, दुःख और कष्टों को हरने वाला ईश्वरीय शक्ति का द्योतक चिन्ह है !

लेख: के.सी.
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