बकलोल राजनीति और बड़बोले नेताओं के दौर में अर्थपूर्ण खामोशी को किस तरह नज़र अंदाज़ किया जाता है इसकी जीती-जागती मिसाल हैं नवीन पटनायक..दरअसल दुनिया में 2 तरह के लोग होते हैं..पहले वो, जो गुम्बद के सबसे ऊपर लगने वाला स्वर्ण कलश ही बनना चाहते हैं..दूसरे वो, जो नींव की ईंट बनकर भी खुश हैं क्योंकि वो जानते हैं कि बिना मजबूत नींव के चमचमाती इमारत नहीं बन सकती है..

नवीन पटनायक इसी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं..टोक्यो ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम (पुरुष और महिला) की जीत से पगलाए देश में ये कितने लोगों को पता है कि दोनों टीमों को ओडिशा ने स्पॉन्सर किया है ? अगर टीम जीती तो (भगवान करें गोल्ड ही लाएं) इनाम की बौछार हो जाएगी लेकिन इस जीत में शायद खिलाड़ियों और सपोर्ट स्टाफ के बात सबसे अहम योगदान नवीन बाबू का ही होगा..उन्होंने टीम की मदद तब की जब जरूरत थी लेकिन इस बात का ढोल नहीं पीटा..कभी चर्चा में नहीं आए..

शायद ये हर उस शख्श की नियति है जिसमें किलर इंस्टिंक्ट की कमी है..जिसमें वो उत्तेजना..रोमांच या सनसनी नहीं होती जो लोगों को सम्मोहित कर सके..उसमें बाढ़ जैसी अराजकता नहीं बल्कि झील जैसी शांति होती है..स्वाभाविक तौर पर इंसानी फितरत ऐसी है कि उस पर सनसनी का असर होता है शांति का नहीं..उसे मद्धम संगीत नहीं सुनाई पड़ता क्योंकि उसे सुनने के लिए जिस भीतरी शांति और धैर्य की ज़रूरत होती है वो विलुप्त होती जा रही है..

  • Deepak Joshi ( TV Journalist )