हिंदू धर्म में माना जाता है- कि इस सृष्टि को ब्रम्हा ने रचा है, बस एक जगह ऐसी है जिसको स्वयं शिव ने रचा है- और वो है काशी! बनारस- जहाँ विश्वनाथ हैं। जहाँ मैंने संकरी गलियाँ देखी, स्कूल जाती साइकिल पर लड़कियाँ, जहाँ मैंने संध्या आरती देखी, और प्रदूषित होती गंगा। जहाँ सुबह विश्वनाथ की आरती के लिए नंगे पैर, लम्बी क़तार लगती है, जहाँ मैं जो अमूमन सुबह दस बजे से पहले नहीं उठती, वो सुबह की आरती के लिए रात एक बजे सोकर तीन बजे उठ गई थी।

सिर्फ हिन्दू ही नहीं बौद्ध धर्म का भी है प्रमुख केंद्र

बनारस का जितना गहरा रिश्ता हिंदू धर्म से है, उतना ही गहरा रिश्ता बौद्ध धर्म से भी है, क़रीब 10 किलोमीटर दूर सारनाथ है। पापा को दर्शन शास्त्र पढ़ने का बहुत शौक़ है, उनका मानना है कि हिंदू धर्म में बहुत गहराई है, और अगर कुछ उसके समकक्ष है तो वह हैं महात्मा बुद्ध। मई की चिलचिलाती धूप में मैं वन्दे भारत एक्सप्रेस से नीचे उतरी थी, उसी समय लगभग चलनी शुरू हुई थी, 6 घंटे का सफ़र था दिल्ली से, बैठे बैठे थक ज़रूर गयी थी पर यह पहली ट्रेन थी जहाँ मैंने कुछ खाया था, पिंड बलूची का खाना दिया गया था, ट्रेन भी साफ़ सुथरी थी।

शायद इसी कि वजह से मैं बनारस जा पाने की हिम्मत कर पायी। मैं “Ganges Grand” होटेल में रुकी थी, बहुत सुविधाजनक था, काशी विश्वनाथ काफ़ी पास था। असंख्य लोग थे संध्या आरती के समय दशाश्वमेध घाट पर, अगर आप शाम को पहले से नहीं बैठेंगे वहाँ तो बीच में से घुसकर निकलना तो भूल ही जाइये।

बनारस के पकवान

पास में काशी चाट भंडार था जहाँ खाना तो बिलकुल बनता है, पर हर जगह भीड़ बहुत है, बहुत संयम चाहिए, जो मेरे अंदर बहुत कम है। होटल का खाना भी बहुतअच्छा था, दिन में और रात का खाना मैंने वहीं किया इसीलिए भी क्यूँकि बाहर बहुत गर्मी थी, सुबह- रात सब एक जैसे थे।

मैं कहीं भी जाती हूँ तो स्थानीय खाना, पहनावे या परिवहन पर ध्यान देती हूँ, यहाँ वो नहीं हो पाया क्यूँकि ध्येय काशी विश्वनाथ थे, तो एक दिन का रुकना था, जिसमें एक सुबह दर्शन के बाद मैंने गंगा में डुबकी लगायी, पर मैं इस बात पर विशेष ध्यान लाना चाहती हूँ, कि गंगा की सफ़ाई को एक ज्वलंत मुद्दा बनाया जाना चाहिए। हमारी नदियाँ, हमारी धरोहर हैं। 20000 करोड़ का नमामि गंगे नामक प्रोजेक्ट शुरू किया गया था, खाने पीने में कम और काम में ज़्यादा लगाया जाएगा तो सबको डुबकी लगाने में मज़ा आएगा, और फिर शायद कैलाश मानसरोवर जाकर पॉलीथीन फेंकने वाले, यहीं पाप धो लें। मैं पहले कभी बनारस नहीं गयी हूँ पर तुलनात्मक दृष्टि से लोग बताते हैं कि अब घाटों और गंगा की हालत बहुत बेहतर है।

संकरी गलियों में बस्ता है बनारस

“ॐ नमो भगवति हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे माँ पावय पावय स्वाहा”

इसका अर्थ है कि, हे भगवति गंगे! मुझे बार-बार मिल, पवित्र कर, पवित्र कर..|
अब इनकी सफ़ाई के लिए भी यही ज़रूरी है- हर सोच, हर मन को… पवित्र हो।

जब मैं कैब में बैठकर शहर भ्रमण कर रही थी, तब मैंने कुछ पंक्तियाँ लिखी थी,
“संकरी गलियाँ, उनमें से रास्ता बनाती नयी सोच
यूँ दिखती हैं हमें, साइकल चला कर जाती बच्चियाँ
तेज़ धूप, लिपटा हुआ चेहरा
भीड़ में भविष्य का एक चेहरा।
कई छोटी दुकानें, दुकानों पर चढ़ी हुई दुकानें
उनमें उतरता पेंट पर बीच में चमकता कहीं एक मॉल
टूटी हुई ईंटो के चढ़ते हुए घर
छज़्ज़ों से दिखते बिजली के सब्स्टेशन
संकरी सी गलियों में पूरा संसार समाया है
हमारे लिए झरोखा भर हो शायद
किसी की ताउम्र है यह ।”

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, और आईआई टी जैसे संस्थान हैं यहाँ, और शिव- शंकर का हाथ, इस शहर पर तो कृपा ही कृपा है। कहीं मेट्रो लाइन का बन रहा खाँचा दिखा मुझे, बहुत आशाजनक शहर है यह। इतनी शोध हो रही है आजकल सतत विकास की परिधि में, कुछ हाथ, सपने और विज्ञान मिलकर क्या कुछ नहीं कर सकते और ईश्वरीय सत्ता तो विराजमान है वहाँ।

बनारस तेरे रंग हज़ार

जैसे कि मैंने बताया, बहुत दिन का कार्यक्रम नहीं था, पर जो कसर हमारे घूमने में रह गयी थी, वो लौटते समय ट्रेन में मेरे साथ बैठे एक छोटे बच्चे ने पूरी कर दी। हमने साथ में “मणिकर्णिका” मूवी देखी और उन्होंने हमें मणिकर्णिका घाट और उसको मूवी की कहानी के बारे में बताया क्यूँकि वो पहले ही देख चुका था। और हर जगह जहाँ वो घूमा था, आते समय वक़्त ज़रूर पता चला था पर लौटते वक़्त उसकी कहानियों और आवाज़ में पता नहीं कहाँ चला गया।

सच बोलूँ तो आज भी मन है, वापस उन गलियों में घूमने का, लस्सी पीने का, नाव में बैठकर उगता हुआ सूरज देखने का जिसकी लालिमा सारा आसमान भर देती है, बहते फूलों के बीच गंगा में डुबकी लगाने का, पर अब पता नहीं कब कोविड का अंधेरा छटेगा, और हम उस शंख ध्वनि में खुद को सराबोर पाएँगे।

घुमक्कड़- यशस्वी बुधानी (IIM Lucknow)