हिन्दी को विश्व भाषा बनाने की शुरुआत घर से करनी होगी-सहस्रबुद्धे

by vaibhav

नई दिल्ली। विश्व हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद द्वारा परिषद के सम्मेलन कक्ष में ‘हिंदी का वैश्विक प्रसार : नई चुनौतियाँ, नए उपाय’ विषयक एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में उद्घाटन वक्तव्य देते हुए आईसीसीआर के अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने हिंदी के प्रसार के लिए तकनीक के उपयोग की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि सोशल मीडिया और सिनेमा आदि के बढ़ते प्रभाव को नजरंदाज कर हिंदी का प्रचार और विस्तार बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। उन्होंने दैनिक जीवन में सहज सरल हिंदी के प्रयोग पर जोर दिया और कहा कि हिंदी को विश्व भाषा बनाने की शुरुआत अपने घर से करनी होगी।

इस अवसर पर आईसीसीआर के महानिदेशक एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री दिनेश कुमार पटनायक ने कहा कि समय आ गया है जब हिंदी शिक्षण प्रशिक्षण के परंपरागत तौर तरीके में आमूल चूल बदलाव कर इसे अधिक से अधिक रोचक बनाया जाए और हिंदी के प्रति भारत और भारत के बाहर के लोगों में एक विशेष आकर्षण का भाव पैदा किया जाए। कार्यक्रम के संयोजक एवं संचालक तथा गगनांचल के संपादक डॉ. आशीष कंधवे विश्व पटल पर हिंदी की स्थिति और उसके व्यापक परिप्रेक्ष्य को पटल पर प्रस्तुत करते हुए हिंदी के प्रसार में आने वाली चुनौतियों की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए उससे निबटने के उपायों पर प्रकाश डाला। इस व्याख्यान में बीज वक्तव्य देते हुए हंसराज कॉलेज के हिंदी विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ. विजय कुमार मिश्र ने कहा कि हाल के वर्षों में दुनिया में भारत की बढती ताकत ने हिंदी के विस्तार को भी नई दिशा दी है और तमाम गतिरोधों और अवरोधों के बावजूद हिंदी का भविष्य बेहद उज्ज्वल है।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता विख्यात साहित्यकार एवं भाषाविद् प्रो. आनंद सिंह ने हिंदी के वैश्विक प्रसार तथा इसके प्रयोग की व्यापकता को सामने रखते हुए इस बात पर जोर दिया कि हिंदी को ज्ञान विज्ञान की भाषा के रूप में स्थापित होने में और अंग्रेजी को अपदस्थ कर उसका स्थान लेने के लिए अभी कई चुनौतियों से पार पाना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी के वैश्विक प्रसार में आईसीसीआर की बड़ी भूमिका है और वह इसे बखूबी निभा भी रहा है। उन्होंने कहा कि हिंदी के लिए हमें अंतरराष्ट्रीय मंचों और मोर्चों के साथ ही भारत में भी लड़ाई लड़नी होगी। हिंदी के विकास और विस्तार की गति संतोषजनक है किंतु इसे और अधिक तेज करने की आवश्यकता है। मास्को स्टेट यूनीवर्सीटी, रूस के मैक्सिम देमचेंको ने अवधी और ब्रज साहित्य के विभिन्न पदों के माध्यम से भारत की भाषिक विविधता और उसकी दिव्यता को सामने रखा और भारतीय संस्कृति की महनीयता पर प्रकाश डाला। व्याख्यान कार्यक्रम के दूसरे मुख्य वक्ता प्रो. उमापति दीक्षित ने अपने विद्वतापूर्ण वक्तव्य देते हुए नई शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं को लेकर दिखाई गई संवेदनशीलता और हिंदी के पक्ष में बनने वाले वातावरण को उत्साहजनक बताया। उन्होंने हिंदी के प्रसार में केंद्रीय हिंदी संस्थान की भूमिका और महत्त्व को भी प्रतिपादित किया। उन्होंने कहा कि मेरा ऐसा अटूट विश्वास है कि हिंदी अपने भाषिक वैशिष्ट्य और प्रवाहमयता के बल पर शीघ्र ही विश्व भाषा बनेगी। कार्यक्रम की शुरुआत आईसीसीआर की वरिष्ठ कार्यक्रम निदेशक (हिंदी) श्रीमती सुलक्षणा भाटिया के स्वागत वक्तव्य से हुआ।

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