जब जय जवान जय किसान का नारा देकर लाल बहादुर शास्त्री ने किसानों और जवानों का हौसला बढ़ाया

by shubham
Published: Last Updated on

भारत की पवित्र धरती पर अनेक ऐसे महापुरुषों ने जन्म लिया है, जिनकी सरलता, बहादुरी, परिश्रम और त्याग से आने वाली कई पीढ़ियों के जीवन में सदैव के लिए ऐसे महापुरुषों की छाप छोड़ जाती है। ऐसे ही एक महापुरुष लाल बहादुर शास्त्री की आज 116वीं जयंती है।

देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भारत की आजादी से लेकर भारत की आज़ादी के बाद तक देश की सुरक्षा और संप्रभुता को कभी आंच नहीं आने दिया। आज़ादी के लिए जेल जा चुके शास्त्री सरल स्वभाव के धनी थे परन्तु देश की संप्रभुता अगर खतरे में आती तो वे कठोर भी बन सकते थे।

अपने बारे में लाल बहादुर शास्त्री कहते थे कि शायद मेरे लंबाई में छोटे होने और नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं दृढ़ नहीं हूं। शारीरिक रूप से मैं मजबूत नहीं हूं लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना भी कमजोर नहीं हूं।

जब सेना को दे दी खुली छूट

भारत – पाक युद्ध 1965 में ये देखने को मिला। उन्होंने भारतीय सेना को खुली छूट दे दी और साथ ही जय जवान, जय किसान का नारा दिया। जो पूरे देश का नारा बन गया।

संकटों को सुलझाने की और मजबूत फैसले लेने की उनके पास क्षमता थी। पाकिस्तान द्वारा भारत में आक्रमण किया गया था। उसी समय देश में अनाज की कमी हो गई थी। सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए और किसानों द्वारा अनाज का उत्पादन बढ़ाने के लिए शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा दिया। यह खेत में काम कर रहे किसान और बॉर्डर पर जवानों के प्रति सम्मान को दर्शाता है और साथ ही उन्हें चुनौतियों से लडने की ताकत भी दिया। 1965 में भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिल्ली के रामलीला मैदान के एक सार्वजनिक सभा में उन्होंने जय जवान, जय किसान का नारा दिया।

“यह जो स्वराज्य आया है उसे हम मजबूती से अपने पास रखेंगे, ताकि कोई दूसरा हमारी तरफ तेरी नजर भी देखें तो हम उसका पूरी तरीके से मुकाबला कर सकें। मैं आपसे कहूंगा कि जो नारे आज लगें वो नारा अगर आप लगाएं तो वही असली नारा है। आज देश के जरूरत के मुताबिक़ एक तो जय जवान का और दूसरा जय किसान का। यह दो नारे मैं समझता हूं कि आज हमारे देश के लिए जरूरी हैं। एक जय जवान और एक जय किसान और फिर उसी से सारे देश का एक जय हिंद का नारा लगता है। यह तीन नारे आपके सामने कहता हूं जय जवान, जय किसान, जय हिंद”

देश के संकटों में लाल बहादुर शास्त्री की भूमिका

आज़ादी के बाद 1960 तक देश में गेहूं और चावल की पैदावार बहुत कम हो गई। देश में पर्याप्त मात्रा में अनाज ना उगने के कारण अमेरिका से आने वाले गेंहू पर निर्भर हो गया था। उस वक़्त देश भूखमरी और अकाल जैसी बड़ी समस्याओं से जूझ रहा था। देश के लोगों और नेताओं को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर किया क्या जाए? अनाज के पैदावार ठहरी रही और आबादी लगातार बढ़ रही थी।

भारत सीमा पर पाकिस्तान से लड़ रहा था। उसी दौरान इस विकट परिस्थिति में शास्त्री ने सबसे एक दिन सप्ताह में व्रत रखने को कहा। इसका लोगों में भरपूर असर हुआ। हर घर के साथ कई होटल और रेस्टोरेंट ने भी इसमें सहयोग दिया और शाम को अपना चूल्हा बंद रखा।

लाल बहादुर शास्त्री ने कृषि को बढ़ावा देने के लिए सिंचाई और खनिज उर्वरकों के साथ साथ मेक्सिको से गेंहू की आयात को मंजूरी दी। उनके इन सभी प्रयासों से 5 सालों में गेंहू की पैदावार 4 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 40 लाख हो गया। 1968 में देश के किसानों ने 170 लाख गेंहू का उत्पादन किया। यह कृषि की क्रांति के रूप में देखी गई। हरित क्रांति में तब्दील हो गई। लाल बहादुर शास्त्री की बहादुरी से किसानों को एक आत्मबल मिला और देखते – देखत 90 के दशक में कृषि में आत्मनिर्भर बन गया।

प्रधानमंत्री का सफर

27 मई, 1964 को उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद देश को अपना अगला नेता चुनना था। ऐसे में सारा भार लाल बहादुर शास्त्री के कंधो पर आ गया। तब के कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष के. कामराज ने शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाई।
और इसी के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने 9 जून, 1994 को प्रधानमंत्री के रूप में पद ग्रहण किया।

उन्होंने अपने प्रधानमंत्री के रूप में पहले भाषण के दौरान बोला, “हर राष्ट्र के जीवन में एक समय ऐसा आता है जब वह इतिहास के चौराहे पर खड़ा होता है और उसे किस रास्ते पर जाना चाहिए। लेकिन हमारे लिए, कोई कठिनाई या झिझक की आवश्यकता नहीं है, कोई दाईं या बाईं ओर नहीं है। हमारा रास्ता सीधा और स्पष्ट है- सभी के लिए स्वतंत्रता और समृद्धि के साथ घर में एक समाजवादी लोकतंत्र का निर्माण, और सभी देशों के साथ विश्व शांति और दोस्ती का रखरखाव।”

लेख:
मानसी शर्मा

Related Posts