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क्यों भारत के लिए आसान नहीं है चीन का बायकॉट करना !

by shubham
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कोरोना महामारी के इस दौर में चीन के बायकॉट की मांग पूरी दुनिया से उठने लगी है | यूरोपियन देशों के अलावा सुपरपावर अमेरिका भी चीन को प्रतिबंधित करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ रहा है | यहाँ तक कि अमेरिका ने वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन पर भी चीन का पक्ष लेने का आरोप लगाते हुए फंडिंग रोकने का एलान किया था |

इन सारी कसरतों के बीच चीन भी अन्य देशों को आखें दिखाने का कोई मौका नहीं चूक रहा है | कुछ दिनों पहले ऑस्ट्रेलिया ने जब कोरोना फैलने की जांच की मांग की थी, तब चीन ने ऑस्ट्रेलिया को धमकाया था |

खैर ये तो बात हो गई चीन और विश्व के अन्य देशों की | अब हम लौटते हैं अपने देश भारत की ओर | भारत में अक्सर ही चीनी कंपनियों और उनके प्रोडक्ट्स के बॉयकॉट की मांग उठती है | कोरोना काल में लॉक डाउन के दौरान जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत बनाने की बात कही तो चीन विरोध का स्वर फिर से तेज हो गया |

नरेंद्र मोदी ने देश को बाहर से आयात होने वाली चीजों का प्रोडक्शन देश में ही करने पर ज़ोर दिया था | जिसके बाद सोशल मीडिया पर चीन के बॉयकॉट का आंदोलन शुरू हो गया | लेकिन क्या वास्तव में आप अपने जीवन से चीन को निकाल पाएंगे ? क्या आप जानते हैं चीन आपके जीवन में कहाँ कहाँ घुसा है ? आज इस डिटेल्ड रिपोर्ट में हम आपको बताएँगे क्यों भारत के लिए आसान नहीं है चीन का बॉयकॉट करना |

दरअसल कोई भी देश किसी अन्य देश में दो तरीकों से अपनी पैठ बनता है | एक प्रत्यक्ष रूप से और दूसरा अप्रत्यक्ष रूप से | आप प्रत्यक्ष रूप से मिलने वाले चाइनीज़ प्रोडक्ट का बॉयकॉट कर सकते हैं, लेकिन वो भी इतना आसान नहीं क्योंकि चाइना से आने वाला प्रोडक्ट देश में मिलने वाले प्रोडक्ट से काफी सस्ता है | अब सवाल आता है कि क्या इन प्रोडक्ट्स को कम दाम पर देश में नहीं बनाया जा सकता |

बिलकुल बनाया जा सकता है लेकिन वो तब ही संभव है जब उस प्रोडक्ट का बल्क प्रोडक्शन हो | दरअसल चीन अपने यहाँ बनने वाले हर सामान का एक बड़ी मात्रा में उत्पादन करता है | जिससे प्रति उत्पाद दर कम हो जाती है और चीन विश्व के अलग अलग देशों में उन प्रोडक्ट्स को निर्यात करता है, जिससे उसके पास स्टॉक की भी समस्या नहीं होती है | इसके साथ ही चीन में लेबर सस्ता और स्किल्ड है, जिससे उत्पादों की क़्वालिटी बेहतर होती है |

अब आते हैं वापस भारत, सवाल यह है कि हम चीन से आयात होने वाले उत्पादों का प्रोडक्शन क्यों नहीं कर सकते | उसका जवाब है कि हम चीन से आयात होने वाली वस्तुओं का प्रोडक्शन देश में कर सकते हैं, लेकिन स्किल्ड लेबर की कमी, लो प्रोडक्शन, टैक्स की मार जैसे तमाम कारण है जिस वजह से देश में बनाया गया सामान देश में ही महंगा हो जाता है और चीन से आने वाला सामान इम्पोर्ट ड्यूटी लगने के बाद भी सस्ता रहता है |

दरअसल किसी भी देश की सरकार सीधे तौर पर किसी ख़ास देश के सामान पर प्रतिबन्ध नहीं लगा सकती | यही वजह है कि सरकार कभी सीधे तौर पर चीन के बायकॉट की बात नहीं कहती | चीन से आयात बढ़ने की वजह से भारत का व्यापार घाटा भी बढ़ता जा रहा है |

जब किसी देश का किसी देश के साथ आयात ज्यादा और निर्यात कम होता है तो उसके अंतर् को व्यापार घाटा बोला जाता है | यानी भारत चीन से आयात ज्यादा करता है और उसके मुक़ाबले निर्यात कम करता है | 2019 में भारत का चीन से व्यापार घटा लगभग 3 बिलियन डॉलर का था |

ये तो बात थी प्रत्यक्ष रूप से चीन के हमारे देश में शामिल होने की | हम मान भी लेते हैं कि हमने चीन से आयात होने वाले प्रोडक्ट देश में बनाने शुरू कर दिए तो क्या उसके बाद भी हम चीन को देश से बाहर निकाल पाएंगे ? उसका जवाब है नहीं ? क्योंकि चीन अप्रत्यक्ष रूप से भी हमारे दैनिक जीवन का एक बड़ा हिस्सा बन चुका है |

देश के लगभग यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स में चीनी कंपनियों ने जम कर इन्वेस्ट किया हुआ है | यूनिकॉर्न उन कंपनियों को बोला जाता है जिनका मार्केट वैल्यू 1 बिलियन डॉलर से ऊपर होता है | इन कंपनियों में तमाम ऐसी भी हैं जो हमारे रोज के इस्तेमाल का जरिया बन चुकी हैं | इन कंपनियों में PayTm, Swiggy, Zomato, Ola, Oyo इत्यादि हैं |

इंडियन स्टार्टअप्स में चीन के इन्वेस्टमेंट का डाटा

आसान भाषा में कहा जाये तो इंडियन टेक्नोलॉजी स्टार्टअप के साथ ही पूरे इंडियन स्टार्टअप इकोसिस्टम पर चीन आधारित इन्वेस्टर्स का कब्जा है | हालाँकि कुछ दिन पहले भारत सरकार की ओर से गाइडलाइन जारी हुई थी जिनमे कुछ देशों के लिए भारत में निवेश से पहले सरकारी मंजूरी लेनी ज़रुरी थी | इस नियम का चीन ने विरोध भी किया था |

स्टार्टअप्स में चीन का निवेश कई बार बहुत सी कंपनियों के समूहों के तौर पर भी होता है जिसमे चीन से बाहर के इन्वेस्टर्स भी शामिल होते हैं | इंडियन स्टार्टअप में चीन या अन्य विदेशी निवेशकों के शामिल होने का मुख्य कारण यह भी है कि देश में रतन टाटा को छोड़कर शायद ही अन्य कोई उद्यमी स्टार्टअप में निवेश के लिए दिलचस्पी दिखाता हो |

इसीलिए इन स्टार्टअप्स को देश के बाहर से निवेशक तलाशने पड़ते हैं और साथ ही अधिकतर स्टार्टअप्स को अपना रजिस्ट्रेशन भी देश के बजाय सिंगापुर में करवाना पड़ता है |

इसके अलावा देश के मोबाइल बाजार पर भी चीन का कब्ज़ा है | मोबाइल कम्पनी से लेकर मोबाइल एप तक चीन के कब्जे में हैं | जिसमे चाइनीज़ एप टिक टॉक मार्केट लीडर है | एक रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में 119 मिलियन से ज्यादा टिक टॉक यूजर हैं |

इन सारी रिपोर्ट्स के आधार पर यह ज़रूर समझ आता है कि आप और हम चाहें तो चीन से होने वाले आयात को तो काबू कर सकते हैं मगर इंडियन स्टार्टअप में निवेश के माध्यम से चीन हमारे और आपके जीवन में इस हद तक दाखिल हो चुका है जिसका बायकॉट करना अब आसान नहीं है |

शुभम

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