आज 12 जून है । और यह दिन पूरी दुनिया में इससे विश्व बाल श्रम निषेध दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि 14 साल से कम उम्र के बच्चे मजदूरी ना करें। लेकिन अभी भी जो वास्तविक हकीकत है वह है दिल को झकझोर देने वाली है।

  • “नन्हे कंधों पर यूं बोझ अभी से ना डालो , पढ़ने दो और आगे बढ़ने दो इनको , कामकाज में अभी ना उतारो”

कहने को तो सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू कर विद्यालय को शत-प्रतिशत नामांकन हासिल करने के निर्देश दिए हैं मगर हकीकत तो यह है कि आज भी कई परिवारों के बच्चों को शिक्षा से नहीं जोड़ा जा सका है।  शहर में एक तबका ऐसा भी है। जिनके बच्चों ने कभी स्कूल की दहलीज पर पांव नहीं रखा, इन परिवारों के बच्चे आज भी गली मोहल्लों में कचरे के ढेर के बीच अपने भविष्य को तलाश रहे हैं इन मासूम बच्चों की भी अन्य बच्चों की तरह अनेक कल्पनाएं होती हैं की वह भी अपनी पीठ पर बस्ता व हाथ में कलम लेकर स्कूल जाएं मगर इन परिवारों में व्याप्त अशिक्षा एवं गरीबी इनकी कल्पनाओं पर पंखा नहीं लगा पाती गौरतलब है कि सरकार ने देश में कोई निरक्षरता का कलंक मिटाने और शिक्षा से वंचित बच्चों को विद्यालय से जोड़ने के लिए शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया था इसके अलावा सर्व शिक्षा अभियान भारत साक्षरता मिशन सहित अन्य कई महत्वाकांक्षी योजना संचालित की है मगर इन योजनाओं का वास्तविक लाभ आज भी नहीं मिल पा रहा है हकीकत तो यह है कि नामांकन अभियान के दौरान एक बार जैसे तैसे इन बच्चों को विद्यालय लाकर उनका नामांकन कर दिया जाता है कुछ दिनों तक तो ठीक-ठाक चलता है उसके बाद वे बच्चे स्वत ही स्कूल आना बंद कर देते हैं

नहीं पढ़ने दे ती गरीबी –

सूत्र बताते हैं कि इन परिवारों में अशिक्षा एवं गरीबी के हालात बच्चों को पढ़ने नहीं देते रही सही कसर इन परिवारों के पुरुषों की शराब पीने की प्रवृत्ति भी बच्चों की स्कूल में बाधक बनती है पेट की आंग और परिवार के पुरुषों के शराब की तड़प को मिटाने के लिए इन बच्चों के नन्हे नन्हे कदम कड़कड़ाती सर्दी हो या झुलसाती गर्मी मौसम के हर तेवर को सहन करते हुए पौ फटने से पूर्व ही नंगे पांव और मेले कुचैले कपड़ों में लिफ्ट अपनी पीठ पर बोरी डालकर प्लास्टिक सहित लोहे की वस्तु घर घर से पुराना सामान रद्दी अन्य सामान तलाशने के लिए निकल पड़ते हैं

छोटी उम्र परिवार का बोझ

अक्सर दिख जाता है कि बाजारों में छोटे नन्हे मुन्ने बच्चे कहीं सब्जी बेच रहे हैं तो कहीं फूल। कई दफा बात भी की उनसे लेकिन ज्यादातर जवाब यही मिला क्या करें भाई साहब घर में दो वक्त की रोटी के लिए काम करना जरूरी है।

✍️ :- हेमंत अग्रवाल

– राजस्थान ब्यूरो