कानपुर की साइबर क्राइम सेल ने एक ऐसे गिरोह का भंडाफोड़ किया है, जिनकी कार्यप्रणाली जानकर पुलिस भी हैरान है। यह गिरोह पुलिस द्वारा जारी किए जाने वाले ‘गुडवर्क’ के प्रेसनोट और अखबारों की खबरों को अपनी ट्रेनिंग मैनुअल की तरह इस्तेमाल करता था। खबरों के जरिए ये लोग बड़े पुलिस अधिकारियों के नाम और उनके बात करने के लहजे को समझते थे और फिर आम जनता को अपना शिकार बनाते थे।
खेतों में सजती थी ठगी की अदालत गिरोह ने कानपुर देहात के गजनेर स्थित मन्नहापुर गांव के खेतों को अपना सुरक्षित ठिकाना बनाया था। साइबर क्राइम प्रभारी सतीश यादव के अनुसार, ये आरोपी सुबह खेतों के अलग-अलग कोनों में जाकर बैठ जाते थे। गिरोह का मास्टरमाइंड पंकज सिंह (बीए पास) खुद इंस्पेक्टर या सीओ बनता था, जबकि कम पढ़े-लिखे सुरेश और दिनेश बड़े अधिकारियों की भूमिका निभाते थे।
सायरन की आवाज से पैदा करते थे खौफ ठगी का शिकार होने वाले व्यक्ति को ये लोग अश्लील वीडियो देखने के फर्जी आरोप में फंसाते थे। गिरफ्तारी का डर दिखाने के लिए ये आरोपी कॉल के दौरान दूसरे फोन से पुलिस सायरन और हूटर की आवाज सुनाते थे, जिससे पीड़ित घबराकर पैसे देने को तैयार हो जाता था। श्रावस्ती के एक पीड़ित प्रमोद कुमार से इन्होंने डीसीपी क्राइम अतुल श्रीवास्तव बनकर 46 हजार रुपये वसूल लिए थे।
कम पढ़े-लिखे लेकिन तकनीकी रूप से शातिर हैरानी की बात यह है कि गिरोह के सदस्य (आठवीं से लेकर इंटर पास) कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद उच्च शिक्षित लोगों को निशाना बनाते थे। पकड़े जाने से बचने के लिए ये केवल पुराने कीपैड फोन का इस्तेमाल करते थे, जबकि स्मार्टफोन का उपयोग सिर्फ फर्जी ‘माफीनामा’ और अधिकारियों की फोटो दिखाने के लिए किया जाता था।
ठगी के पैसों का पेट्रोल पंप कनेक्शन जांच में सामने आया है कि ये गिरोह सीधे अपने बैंक खातों में पैसा नहीं मंगवाता था। आरोपियों ने कई जनसेवा केंद्रों और पेट्रोल पंप संचालकों को झांसे में लेकर उनके QR कोड और नंबरों का इस्तेमाल रकम ट्रांसफर कराने के लिए किया। फिलहाल पुलिस इस गिरोह के अन्य सदस्यों की तलाश में जुटी है।
