कानपुर। शहर की घनी आबादी वाले इलाकों में मौत का जाल बिछा हुआ है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी गहरी नींद में सो रहे हैं। कानपुर विकास प्राधिकरण (KDA), नगर निगम और फायर ब्रिगेड की नाक के नीचे साढ़े चार हजार से ज्यादा ‘मौत के तहखाने’ (बेसमेंट) सक्रिय हैं। ताज्जुब की बात यह है कि दो साल पहले दिल्ली के कोचिंग सेंटर हादसे और पिछले साल कानपुर के प्रेम नगर अग्निकांड में हुई मौतों के बावजूद प्रशासन ने कोई ठोस सबक नहीं लिया है। आज भी शहर के हजारों छात्र, मरीज और ग्राहक इन अंधेरे बेसमेंटों में अपनी जान जोखिम में डालकर बैठ रहे हैं।
कागजों में सिमटी कार्रवाई: नोटिस-नोटिस का खेल
पुलिस, केडीए और फायर ब्रिगेड द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई एक चौंकाने वाली सूची के अनुसार, शहर में 4445 से अधिक ऐसे प्रतिष्ठान हैं जो बेसमेंट में अवैध रूप से संचालित हो रहे हैं। इनमें कोचिंग सेंटर, मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल, गेस्ट हाउस, डायग्नोस्टिक लैब्स और बड़े शोरूम शामिल हैं। सूत्रों का कहना है कि विभाग केवल ‘नोटिस-नोटिस’ का खेल खेल रहे हैं। धरातल पर सीलिंग की कार्रवाई कछुआ गति से भी धीमी है, जिससे अवैध कारोबारियों के हौसले बुलंद हैं।
हॉटस्पॉट: जहाँ नियमों की उड़ रही धज्जियां
कानपुर के काकादेव (कोचिंग हब), हर्ष नगर, बर्रा, जाजमऊ, कल्याणपुर और मुस्लिम बाहुल्य इलाके इस समय बारूद के ढेर पर हैं। विशेष रूप से काकादेव में दर्जनों कोचिंग सेंटर बेसमेंट में चल रहे हैं, जहाँ न तो इमरजेंसी एग्जिट है और न ही वेंटिलेशन की व्यवस्था। सागर मार्केट और रहमानी मार्केट जैसी तंग गलियों में चल रहे जूते-चप्पल और कपड़ों के गोदामों में फायर अलार्म और स्प्रिंकलर सिस्टम का नामोनिशान नहीं है।
आंकड़ों में खतरे की भयावहता
प्रशासनिक रिपोर्ट के अनुसार, बेसमेंट में चल रहे अवैध प्रतिष्ठानों का ब्यौरा कुछ इस प्रकार है:
- 55+ गेस्ट हाउस: बिना किसी सुरक्षा मानक के बेसमेंट में चल रहे हैं।
- 218+ मार्केट/दुकानें: संकरी गलियों के बेसमेंट में संचालित।
- 34+ अवैध कोचिंग सेंटर: काकादेव और स्वरूप नगर में मुख्य रूप से सक्रिय।
- 195+ कारखाने: अवैध रूप से बेसमेंट में फैक्ट्रियां चल रही हैं।
- कुल 4445+ प्रतिष्ठान: जो सुरक्षा मानकों को ताक पर रखे हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना
बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर बिना फायर एनओसी (NOC) के इन भवनों के नक्शे कैसे पास हो गए? सुप्रीम कोर्ट के सख्त दिशा-निर्देशों के बावजूद इन बहुमंजिला इमारतों को संचालन की अनुमति कैसे मिली? जानकारों का मानना है कि यह सब ‘अफसरों की विशेष कृपा’ और भ्रष्टाचार के चलते हो रहा है। नियमों के मुताबिक, बेसमेंट का उपयोग केवल पार्किंग या स्टोर के लिए किया जा सकता है, लेकिन यहाँ व्यावसायिक गतिविधियाँ धड़ल्ले से जारी हैं।
अधिकारियों का पक्ष: केवल आश्वासन की घुट्टी
मामले पर जब उच्चाधिकारियों से बात की गई, तो उनका कहना है कि सूची शासन को भेज दी गई है। जांच के बाद जवाब मांगा जाएगा और संतोषजनक जवाब न मिलने पर सीलिंग की जाएगी। लेकिन सवाल वही है—क्या प्रशासन किसी मासूम की जान जाने का इंतजार कर रहा है? क्या प्रेम नगर जैसा अग्निकांड फिर से दोहराया जाएगा? फिलहाल, फायर विभाग और केडीए की टीम किसी भी बड़ी कार्रवाई के मूड में नहीं दिख रही है।
