कानपुर न्यायालय में ‘घूसखोर पंडित’ फिल्म के खिलाफ परिवाद दर्ज - NewsKranti

कानपुर न्यायालय में ‘घूसखोर पंडित’ फिल्म के खिलाफ परिवाद दर्ज

ओटीटी फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ के विवादित शीर्षक और संवादों को लेकर कानपुर के अधिवक्ता नितिश मिश्रा ने कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई है। आरोप है कि फिल्म समाज में घृणा फैलाने और ब्राह्मणों की छवि धूमिल करने के लिए बनाई गई है।

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ख़बर एक नज़र में :
  • शिकायत का स्थान: न्यायिक मजिस्ट्रेट (JM-4), कानपुर नगर न्यायालय।
  • नामजद आरोपी: निर्माता, निर्देशक, अभिनेता और नेटफ्लिक्स समेत 6 विपक्षी।
  • विवाद की वजह: फिल्म का शीर्षक ‘घूसखोर पंडित’ और आपत्तिजनक संवाद।
  • मुख्य धाराएं: IPC 295A, 153A और 505(2)।
  • अगली स्थिति: कोर्ट के आदेश पर टिकेगी फिल्म की किस्मत।

कानपुर, 07 फरवरी 2026। मनोरंजन की दुनिया में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर रिलीज होने वाली फिल्मों के विवाद थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। कानपुर की एक अदालत में शनिवार को अपकमिंग फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ के खिलाफ एक आपराधिक परिवाद दायर किया गया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि फिल्म का शीर्षक और इसके संवाद जानबूझकर ब्राह्मण समाज की धार्मिक भावनाओं को आहत करने और समाज के प्रति घृणा फैलाने के उद्देश्य से तैयार किए गए हैं।

JM-4 कोर्ट में पहुंचा मामला: नेटफ्लिक्स भी लपेटे में

यह कानूनी मोर्चा अधिवक्ता नितिश मिश्रा द्वारा कानपुर नगर के न्यायिक मजिस्ट्रेट (JM-4) की अदालत में खोला गया है। परिवाद में न केवल फिल्म के निर्माता और निर्देशक को नामजद किया गया है, बल्कि मुख्य अभिनेता, प्रोडक्शन हाउस और ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स (Netflix) सहित कुल छह पक्षों को विपक्षी बनाया गया है।

आपत्ति का मुख्य केंद्र: ‘सम्मान’ बनाम ‘अपमान’

परिवादी अधिवक्ता नितिश मिश्रा ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि ‘पंडित’ शब्द सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में विद्वत्ता और सम्मान का प्रतीक है। इस पावन शब्द के साथ ‘घूसखोर’ जैसे नकारात्मक विशेषण का प्रयोग करना पूरे समाज को अपमानित करने की साजिश है।

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  • संवादों पर विवाद: फिल्म के टीज़र में इस्तेमाल किए गए कुछ संवादों पर गहरी आपत्ति जताई गई है। आरोप है कि ये संवाद समाज में ब्राह्मणों के प्रति एक नकारात्मक और भ्रष्ट धारणा बनाने की कोशिश करते हैं।
  • मुनाफे की राजनीति: शिकायत में यह भी कहा गया है कि फिल्म निर्माताओं ने जानबूझकर विवाद पैदा करने वाला शीर्षक चुना है ताकि विवाद के जरिए फिल्म को पब्लिसिटी मिले और आर्थिक लाभ कमाया जा सके।

पुलिस ने नहीं सुनी तो खटखटाया अदालत का दरवाजा

अधिवक्ता नितिश मिश्रा ने बताया कि उन्होंने 06 फरवरी को कोतवाली थाने में इस मामले की लिखित शिकायत दी थी। लेकिन पुलिस ने इसे “समाज का निजी मामला” बताकर एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया। पुलिस के इसी ढुलमुल रवैये के बाद पीड़ित पक्ष ने न्यायालय की शरण ली और दंड प्रक्रिया संहिता के तहत कार्रवाई की मांग की।

इन गंभीर धाराओं में हो सकती है कार्रवाई

परिवाद में मांग की गई है कि आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की निम्नलिखित गंभीर धाराओं के तहत संज्ञान लिया जाए:

  1. धारा 295A: धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर आहत करना।
  2. धारा 153A: धर्म और जाति के आधार पर विभिन्न वर्गों के बीच वैमनस्य फैलाना।
  3. धारा 505(2): सार्वजनिक रूप से भड़काऊ बयान देना जो समाज में भय या घृणा पैदा करें।

अधिवक्ताओं की चेतावनी: “रिलीज नहीं होने देंगे”

इस मामले में सहयोग कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता प्रत्यूष मनी मिश्रा ने तीखे शब्दों में कहा कि कला के नाम पर किसी विशेष जाति या धर्म को निशाना बनाना स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा, “यह फिल्म सीधे तौर पर ब्राह्मण समाज के गौरव पर हमला है। हम इसे देशभर में किसी भी कीमत पर रिलीज नहीं होने देंगे।”

अब आगे क्या?

न्यायालय ने परिवाद को स्वीकार करते हुए इस पर विचार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अब कोर्ट तय करेगा कि आरोपियों को समन जारी कर तलब किया जाए या फिर संबंधित थाना क्षेत्र की पुलिस से इस मामले में प्रारंभिक जांच रिपोर्ट मांगी जाए।

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