डिल्लेश्वर महादेव मंदिर विवाद: उपजिलाधिकारी की ‘चुप्पी’ पर उठे सवाल, क्या प्रशासन को है किसी बड़े तनाव का इंतज़ार? – NewsKranti

डिल्लेश्वर महादेव मंदिर विवाद: उपजिलाधिकारी की ‘चुप्पी’ पर उठे सवाल, क्या प्रशासन को है किसी बड़े तनाव का इंतज़ार?

थाना मंगलपुर के डिलवल गांव में हजारों वर्ष पुराने मंदिर के जीर्णोद्धार कार्य को कुछ लोगों द्वारा बाधित किया जा रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों के मौके पर न पहुँचने से कानून-व्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

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ख़बर एक नज़र में :
  • *विवाद का केंद्र:* प्राचीन डिल्लेश्वर महादेव मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य।
  • *प्रशासनिक विफलता:* सूचना के बाद भी एसडीएम या तहसीलदार का मौके पर न पहुँचना।
  • *अभिलेखों की स्थिति:* मंदिर स्थल सरकारी दस्तावेजों में 'आबादी' के रूप में दर्ज।
  • *हिंदू संगठनों का रुख:* बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद ने जताया विरोध।

कानपुर देहात (रिपोर्टर: प्रशांत श्रीवास्तव):


जनपद के मंगलपुर थाना क्षेत्र स्थित डिलवल गांव में इन दिनों आस्था और अवरोध के बीच तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। गांव की पहचान कहे जाने वाले हजारों वर्ष पुराने डिल्लेश्वर महादेव मंदिर के जीर्णोद्धार कार्य को लेकर उपजा विवाद अब प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण आक्रोश की ज्वाला बनता जा रहा है।

आस्था और इतिहास का संगम

ग्रामीणों का अटूट विश्वास है कि यह वही पावन स्थल है जहाँ तालाब से स्वयं शिवलिंग प्रकट हुए थे। इसी मंदिर की महिमा के कारण गांव का नाम ‘डिलवल’ पड़ा। सरकारी अभिलेखों में भी यह मंदिर स्थल स्पष्ट रूप से ‘आबादी’ के रूप में दर्ज है, जो इसके अस्तित्व की वैधानिकता को सिद्ध करता है।

सुविधाओं के बाद भी हठधर्मिता

मंदिर का जीर्णोद्धार गांव के ही राकेश चंद्र बाजपेयी द्वारा जनहित में कराया जा रहा है। विरोध कर रहे पक्ष की शिकायतों को देखते हुए उन्हें 16 फीट का रास्ता, नाली और इंटरलॉकिंग की सुविधा पहले ही दी जा चुकी है। इसके बावजूद, कुछ अराजक तत्वों और महिलाओं द्वारा निर्माण सामग्री फेंककर कार्य को बलपूर्वक रोका जा रहा है।

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अधिकारियों की उदासीनता: कानून-व्यवस्था पर सवाल

मामले की गंभीरता को देखते हुए बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता भी मौके पर पहुँचे, लेकिन विरोध कम नहीं हुआ। पुलिस ने स्थिति को संभालने के लिए उपजिलाधिकारी (एसडीएम) सिकंदरा को अवगत कराते हुए उनके निर्णय तक कार्य रुकवा दिया।

हैरानी की बात यह है कि अति-संवेदनशील मामला होने के बावजूद न तो एसडीएम स्वयं मौके पर पहुँचे और न ही उन्होंने तहसीलदार को भेजा। केवल एक लेखपाल को भेजकर औपचारिकता पूरी कर ली गई। प्रशासन की यह सुस्ती अराजक तत्वों के मनोबल को बढ़ा रही है।

निष्कर्ष और मांग

जब जमीन आबादी में दर्ज है और विरोध करने वालों की उचित मांगें पहले ही मान ली गई हैं, तो फिर अवैध अवरोध पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन की चुप्पी पक्षपातपूर्ण और संदेहास्पद है। यदि समय रहते निष्पक्ष निर्णय लेकर जीर्णोद्धार कार्य शुरू नहीं कराया गया, तो बढ़ते जनाक्रोश की पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।


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