प्रयागराज/कानपुर। उत्तर प्रदेश के सबसे चर्चित और रूह कंपा देने वाले ‘बिकरू कांड’ में कुख्यात अपराधी विकास दुबे के सहयोगियों को इलाहाबाद हाईकोर्ट से तगड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने मामले के नामजद आरोपी जहान यादव और अन्य की जमानत याचिकाओं को खारिज करते हुए उन्हें राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति वानी रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान मामले की गंभीरता और शहादत देने वाले पुलिसकर्मियों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए यह फैसला सुनाया।
समानता की दलील नहीं आई काम
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे वकीलों ने कोर्ट में तर्क दिया कि इस मामले के एक अन्य सह-आरोपी शिव तिवारी को पहले ही जमानत मिल चुकी है। ऐसे में ‘समानता के अधिकार’ (Parity) के आधार पर जहान यादव और अन्य को भी रिहा किया जाना चाहिए।
हालांकि, सरकारी अधिवक्ता ने इस दलील का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि:
- जहान यादव पर गैंगस्टर एक्ट के तहत गंभीर मामले दर्ज हैं।
- घटना की रात आरोपियों ने न केवल पुलिस पर गोलियां बरसाईं, बल्कि उनकी घेराबंदी कर उन्हें भागने का मौका भी नहीं दिया।
- इन आरोपियों की सक्रिय भूमिका के कारण ही 8 पुलिसकर्मी शहीद हुए थे।
बिकरू कांड: वो काली रात जब दहल उठा था देश
गौरतलब है कि 2-3 जुलाई 2020 की आधी रात को कानपुर के चौबेपुर थाना क्षेत्र के बिकरू गांव में कुख्यात अपराधी विकास दुबे को पकड़ने गई पुलिस टीम पर घात लगाकर हमला किया गया था। विकास दुबे और उसके गुर्गों ने छतों से अंधाधुंध फायरिंग की थी, जिसमें सीओ देवेंद्र मिश्रा समेत 8 पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे। हमले के बाद आरोपियों ने पुलिसकर्मियों के सरकारी हथियार भी लूट लिए थे और शवों के साथ बर्बरता करने की कोशिश की थी।
ट्रायल कोर्ट का फैसला और वर्तमान स्थिति
बिकरू मामले में अब तक की कानूनी कार्रवाई काफी सख्त रही है:
- सजा: ट्रायल कोर्ट ने पूर्व में ही 23 आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी।
- एनकाउंटर: मुख्य आरोपी विकास दुबे और उसके 5 साथी पुलिस एनकाउंटर में मारे जा चुके हैं।
- ताजा अपडेट: हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब आरोपियों को लंबे समय तक जेल की सलाखों के पीछे ही रहना होगा।
कानून का इकबाल बुलंद, अपराधियों में खौफ
बिकरू कांड की सुनवाई पर पूरे उत्तर प्रदेश की नजरें टिकी रहती हैं। हाईकोर्ट के इस कड़े रुख से स्पष्ट है कि खाकी पर हाथ डालने वाले अपराधियों के लिए कानून में कोई सहानुभूति नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत देना कोर्ट का विवेकाधिकार है और बिकरू जैसे मामले में, जहाँ राज्य की मशीनरी पर हमला हुआ हो, वहाँ ढिलाई नहीं दी जा सकती।
