कानपुर। उत्तर प्रदेश के सबसे हाई-प्रोफाइल सड़क हादसों में शुमार कानपुर लैंबॉर्गिनी केस में गुरुवार को एक नया मोड़ आ गया। शहर की एसीएमएम (ACMM) कोर्ट ने मुख्य आरोपी शिवम मिश्रा को बड़ी राहत देते हुए उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश सुनाया। इस फैसले के साथ ही कानपुर पुलिस की उन कोशिशों को करारा झटका लगा है, जिसके तहत वे आरोपी को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने की मांग कर रहे थे।
यह मामला अपनी लग्जरी कार और हादसे की भयावहता के कारण पहले से ही राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में बना हुआ था। पुलिस की दलील थी कि आरोपी ने तेज रफ्तार कार से सुरक्षा नियमों की अनदेखी की, लेकिन अदालत में कानूनी प्रक्रियाओं की ‘सुस्त चाल’ पुलिस पर ही भारी पड़ गई।
अदालत की सख्त टिप्पणी: नोटिस प्रक्रिया पर फंसे विवेचक
कोर्ट रूम में चली लंबी बहस के दौरान पुलिस की जांच प्रक्रिया और कानूनी औपचारिकताओं पर गंभीर सवाल उठे। न्यायालय ने मुख्य रूप से पुलिस द्वारा दिए गए नोटिस की तामीली को आधार बनाया।
- नोटिस का अभाव: बचाव पक्ष के वकीलों ने दलील दी कि पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों (अर्नेश कुमार जजमेंट) का पालन नहीं किया। विवेचक अदालत में यह साबित करने में विफल रहे कि आरोपी को नियमानुसार दो बार नोटिस दिया गया था।
- रिमांड अर्जी खारिज: अदालत ने माना कि जब पुलिस ने गिरफ्तारी से पहले उचित नोटिस प्रक्रिया का पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया है, तो 14 दिन की न्यायिक रिमांड का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।
- मुचलके पर रिहाई: एसीएमएम कोर्ट ने शिवम मिश्रा को 20,000 रुपये के निजी मुचलके पर जमानत दे दी।
हादसे की कड़ियां: ड्राइविंग सीट पर था शिवम
पुलिस द्वारा दाखिल की गई अब तक की केस डायरी और जांच रिपोर्ट के अनुसार, जिस वक्त यह भीषण हादसा हुआ, उस समय करोड़ों की कीमत वाली लैंबॉर्गिनी की ड्राइविंग सीट पर शिवम मिश्रा ही मौजूद था। चश्मदीदों और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर पुलिस ने शिवम को मुख्य आरोपी बनाया था।
हादसे के बाद से ही शहर में चर्चा थी कि रसूखदार परिवार से ताल्लुक रखने के कारण जांच को प्रभावित किया जा सकता है, लेकिन पुलिस ने दावा किया था कि वे वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर पैरवी कर रहे हैं। हालांकि, कोर्ट में तकनीकी खामियों के चलते पुलिस को पहले दौर में हार का सामना करना पड़ा है।
हाई-प्रोफाइल केस: आगे क्या होगा?
कोर्ट के इस फैसले के बाद कानून के जानकारों का मानना है कि पुलिस अब इस आदेश के खिलाफ उच्च अदालत (सेशन कोर्ट) का दरवाजा खटखटा सकती है। वहीं, स्थानीय लोगों में इस फैसले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया है। यह मामला एक बार फिर चर्चा में है कि क्या पुलिस की ‘कमजोर पैरवी’ ने आरोपी को राहत दिलाई या फिर यह पूरी तरह से पुलिस की प्रक्रियात्मक चूक का नतीजा है।
अब सबकी निगाहें पुलिस की अगली चार्जशीट और आगामी सुनवाई पर टिकी हैं कि क्या पुलिस शिवम मिश्रा के खिलाफ ठोस सबूत पेश कर पाएगी या यह हाई-प्रोफाइल मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा।
