मिलान/कॉर्टीना द’आम्पेज़ो: फरवरी 2026 में जब इटली के मिलान और कॉर्टीना द’आम्पेज़ो में विंटर ओलंपिक की मशाल प्रज्वलित होगी, तो दुनिया सिर्फ एथलीटों के बीच पदक की जंग नहीं देखेगी। असली मुकाबला होगा बर्फ और बढ़ती गर्मी के बीच। ताज़ा वैज्ञानिक रिपोर्टों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन अब विंटर ओलंपिक जैसी प्रतिष्ठित वैश्विक प्रतियोगिताओं के अस्तित्व को ही मिटाने पर आमादा है।
70 सालों में बदल गई तस्वीर: कॉर्टीना अब ‘ठंडा’ नहीं रहा
कॉर्टीना द’आम्पेज़ो ने 1956 में भी विंटर ओलंपिक की मेज़बानी की थी। लेकिन आज का कॉर्टीना सात दशक पहले जैसा नहीं है। आंकड़ों के अनुसार, 1956 की तुलना में यहाँ फरवरी का औसत तापमान 3.6 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। पहले जहाँ पारा माइनस 7 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता था, अब वह शून्य (Freezing point) को छू रहा है।
“यह तापमान में मामूली बदलाव नहीं है; यह खेल की सतह के जमने और पिघलने के बीच की निर्णायक रेखा है।” – जलवायु विशेषज्ञों की राय
प्राकृतिक बर्फ गायब, 30 लाख क्यूबिक यार्ड ‘नकली बर्फ’ का सहारा
हालात इतने गंभीर हैं कि ऊँचे आल्प्स पहाड़ों पर स्थित होने के बावजूद इटली को प्राकृतिक बर्फ पर भरोसा नहीं रहा। आयोजकों को 2026 के खेलों के लिए 30 लाख क्यूबिक यार्ड से ज़्यादा कृत्रिम बर्फ (Artificial Snow) तैयार करनी पड़ रही है। यह न केवल आयोजन की लागत को अरबों में ले जा रहा है, बल्कि खिलाड़ियों की सुरक्षा के लिए भी खतरा है। गीली और असमान बर्फ की सतह पर एथलीटों के चोटिल होने का जोखिम 40% तक बढ़ जाता है।
खतरे में विंटर पैरालंपिक का भविष्य
विंटर पैरालंपिक खेलों की स्थिति और भी भयावह है। ये खेल आमतौर पर मार्च में आयोजित होते हैं जब वसंत की दस्तक से तापमान और बढ़ जाता है। शोध बताते हैं कि 2050 तक दुनिया के केवल एक-चौथाई शहर ही ऐसे बचेंगे, जहाँ पैरालंपिक के लिए पर्याप्त प्राकृतिक बर्फ और सही तापमान उपलब्ध होगा।
मुख्य बिंदु: जो आपको जानना जरूरी है
- तापमान में वृद्धि: पिछले 19 मेज़बान शहरों में 1950 के बाद औसतन 2.7°C तापमान बढ़ चुका है।
- घटती बर्फ: 1970 के दशक से अब तक कॉर्टीना में बर्फ की गहराई 15 सेंटीमीटर तक कम हो गई है।
- प्रदूषण और स्पॉन्सरशिप: एक नई रिपोर्ट (Olympics Torched) के अनुसार, ओलंपिक के बड़े प्रायोजक ही भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से विंटर स्पोर्ट्स को खत्म कर रहा है।
- संकट में हिमालय: इसका असर केवल यूरोप तक सीमित नहीं है, भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी बर्फबारी में 75-80% की गिरावट दर्ज की गई है।
क्या 2030 तक ‘क्लाइमेट पॉजिटिव’ होगा ओलंपिक?
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) का लक्ष्य है कि 2030 तक इन खेलों को “क्लाइमेट पॉजिटिव” बनाया जाए। लेकिन वैज्ञानिकों का तर्क है कि अगर उत्सर्जन की यही रफ्तार रही, तो तकनीक और प्रबंधन भी खेलों को नहीं बचा पाएंगे। सदी के अंत तक आउटडोर विंटर स्पोर्ट्स लगभग नामुमकिन हो सकते हैं।
यह विंटर ओलंपिक एक चेतावनी है—इंसान और प्रकृति के बीच बिगड़ते संतुलन की। अगर हमने समय रहते ग्लोबल वॉर्मिंग पर लगाम नहीं लगाई, तो आने वाली पीढ़ियां विंटर ओलंपिक केवल वीडियो गेम में ही देख पाएंगी।
