भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर बूम: अरबों का निवेश दांव पर, क्या जलवायु आपदाएं डुबो देंगी आपकी मेहनत? – NewsKranti

भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर बूम: अरबों का निवेश दांव पर, क्या जलवायु आपदाएं डुबो देंगी आपकी मेहनत?

भारत में सड़कें, सुरंगें और पोर्ट्स तेज़ी से बन रहे हैं, लेकिन क्या वे जलवायु परिवर्तन से सुरक्षित हैं? क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिपोर्ट 'Climate Risk and Insurance' ने बुनियादी ढांचे और बीमा क्षेत्र की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

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ख़बर एक नज़र में :
  • भारत का ₹2.95 लाख करोड़ का निवेश (पोर्ट्स, टनल, हाइड्रोपावर) उच्च जलवायु जोखिम वाले क्षेत्रों में है।
  • वर्ष 2000 से अब तक प्राकृतिक आपदाओं के कारण भारत को 99 अरब डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ है।
  • भारत में लगभग 91% जलवायु संबंधी नुकसान का कोई बीमा कवर (Protection Gap) नहीं है।
  • हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे क्षेत्र 'अनइंश्योरबल' (बीमा न करने योग्य) होने की स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं।
  • बीमा कंपनियां (SBI General, Munich Re आदि) मानती हैं कि मौजूदा रिस्क मॉडलिंग मॉडल अब नाकाफी हैं।

भारत वर्तमान में अपने इतिहास के सबसे महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा विस्तार (Infrastructure Expansion) के दौर से गुजर रहा है। हिमालय की गोद में बनी रणनीतिक सुरंगों से लेकर समुद्र तटों पर सजते आधुनिक बंदरगाहों तक, विकास की गति अकल्पनीय है। लेकिन, इस कंक्रीट के साम्राज्य के पीछे एक कड़वा सच छिपा है। क्लाइमेट ट्रेंड्स (Climate Trends) की नवीनतम रिपोर्ट ‘Climate Risk and Insurance for India’s Infrastructure Projects’ ने चेतावनी दी है कि भारत का यह ‘इंफ्रा बूम’ प्रकृति के बढ़ते गुस्से के सामने असहाय नजर आ रहा है।

2025: जब मौसम बना सबसे बड़ी चुनौती

रिपोर्ट के मुख्य लेखक अनिरुद्ध भट्टाचार्य और शोधकर्ताओं (पलक बल्यान, मृण्मय चटर्जी, अर्चना चौधरी) ने रेखांकित किया है कि 2025 ने जलवायु परिवर्तन के पैटर्न को पूरी तरह बदल दिया है। अब बाढ़, चक्रवात और भूस्खलन ‘दुर्लभ’ नहीं बल्कि ‘नियमित’ घटनाएं बन चुकी हैं। देश के शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को जोखिम के पैमाने पर 5 में से 4 से 5 का स्कोर दिया गया है, जो ‘अत्यधिक उच्च’ जोखिम की श्रेणी है।

₹2.95 लाख करोड़ दांव पर: जोखिम के हॉटस्पॉट

रिपोर्ट के अनुसार, भारत की सबसे बड़ी परियोजनाएं उन्हीं क्षेत्रों में हैं जो सबसे अधिक संवेदनशील हैं।

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  • ओडिशा और आंध्र प्रदेश: चक्रवातों की चपेट में आने वाले पारादीप और नए पोर्ट प्रोजेक्ट्स।
  • हिमालयी क्षेत्र: उत्तराखंड-हिमाचल की सड़कें, लद्दाख की ज़ोजिला टनल और सिक्किम का तीस्ता प्रोजेक्ट।
  • पूर्वोत्तर: अरुणाचल प्रदेश की विशाल जलविद्युत परियोजनाएं।

इन परियोजनाओं में करीब 2.95 लाख करोड़ रुपये का निवेश है। यदि जलवायु आपदाएं इसी गति से आती रहीं, तो इन संपत्तियों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।

बीमा क्षेत्र की चिंता: क्या भारत ‘अनइंश्योरबल’ हो जाएगा?

सबसे चौंकाने वाला खुलासा बीमा क्षेत्र को लेकर हुआ है। रिपोर्ट के लिए जब SBI General Insurance, Munich Re India, और Swiss Re India जैसी दिग्गज कंपनियों से बात की गई, तो उन्होंने स्वीकार किया कि उनके पास भविष्य के जलवायु जोखिमों को मापने का कोई सटीक मॉडल नहीं है।

आरती खोसला, संस्थापक निदेशक (क्लाइमेट ट्रेंड्स) कहती हैं, “खतरा यह नहीं कि बीमा मिलना बंद हो जाएगा, बल्कि खतरा यह है कि बीमा की कीमतें इतनी बढ़ जाएंगी कि वे आम प्रोजेक्ट्स की पहुंच से बाहर हो जाएंगी।” वर्तमान में भारत का 91 प्रतिशत जलवायु नुकसान अनइंश्योर्ड (Uninsured) रहता है, जिसका सीधा आर्थिक बोझ सरकारी खजाने और टैक्सपेयर्स पर पड़ता है।

अमेरिका जैसी स्थिति की चेतावनी

रिपोर्ट में अमेरिका के कैलिफोर्निया और फ्लोरिडा का उदाहरण दिया गया है, जहां बार-बार आने वाली आग और तूफानों के कारण बीमा कंपनियों ने कवरेज देना बंद कर दिया है। भारत के उत्तराखंड और हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य भी इसी दिशा में बढ़ रहे हैं। यदि नुकसान ‘निश्चित’ हो जाता है, तो कोई भी निजी कंपनी उसका जोखिम नहीं उठाएगी।

समाधान की राह: कंक्रीट से आगे की सोच

रिपोर्ट का सुझाव है कि भारत को अब केवल निर्माण पर नहीं, बल्कि ‘सहनशील निर्माण’ (Resilient Infrastructure) पर ध्यान देना होगा। इसमें पैरामीट्रिक इंश्योरेंस (Parametric Insurance) और बेहतर डेटा मॉडलिंग जैसे आधुनिक हथियारों का उपयोग अनिवार्य है। समय आ गया है कि हम विकास की परिभाषा में प्रकृति के मिजाज को भी शामिल करें।

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