नई दिल्ली/वाराणसी |
ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक बार फिर अपने बेबाक अंदाज के कारण चर्चा में हैं। इस बार उनके निशाने पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) है। शंकराचार्य ने यूजीसी की हालिया नीतियों और संस्कृत विश्वविद्यालयों के प्रति अपनाए जा रहे रवैये पर कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि देश की प्राचीन भाषा और ज्ञान परंपरा को आधुनिक मानकों की आड़ में दबाने की कोशिश की गई, तो इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
क्या है विवाद की मुख्य जड़?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब यूजीसी ने देश के विभिन्न संस्कृत विश्वविद्यालयों के लिए नए दिशा-निर्देश और ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने की बात कही। शंकराचार्य का आरोप है कि यूजीसी संस्कृत संस्थानों को भी उसी तराजू में तौल रहा है, जिसमें आधुनिक विज्ञान और तकनीकी संस्थानों को तौला जाता है। उन्होंने तर्क दिया कि संस्कृत शिक्षा केवल एक डिग्री नहीं, बल्कि एक ‘जीवन पद्धति’ और ‘परंपरा’ है, जिसे पश्चिमी ढांचे में फिट नहीं किया जा सकता।
“संस्कृत के साथ सौतेला व्यवहार बंद हो”
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि एक तरफ सरकार भारतीय संस्कृति और गौरव की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ उसकी संस्थाएं संस्कृत के विद्वानों और छात्रों के लिए कठिन शर्तें थोप रही हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यूजीसी के अधिकारी संस्कृत की बारीकियों और इसकी गुरु-शिष्य परंपरा को समझते हैं? उनके अनुसार, संस्कृत विश्वविद्यालयों पर थोपे जा रहे जटिल नियम उनकी मौलिकता को नष्ट कर रहे हैं।
शिक्षा के ‘पश्चिमीकरण’ पर उठाए सवाल
शंकराचार्य ने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि भारत में शिक्षा का ढांचा अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रसित है। उन्होंने कहा, “हम अपनी जड़ों की ओर लौटने की बात करते हैं, लेकिन हमारे संस्थान आज भी मैकाले की शिक्षा पद्धति के गुलाम बने हुए हैं। संस्कृत विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता मिलनी चाहिए ताकि वे शास्त्रों और वेदों की रक्षा कर सकें, न कि केवल क्लर्क पैदा करने की मशीन बनें।”
धार्मिक और सांस्कृतिक जगत में हलचल
शंकराचार्य के इस बयान के बाद धार्मिक और शैक्षणिक हलकों में नई बहस छिड़ गई है। काशी से लेकर हरिद्वार तक के विद्वानों ने शंकराचार्य के सुर में सुर मिलाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार ने इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया, तो यह विवाद एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है, क्योंकि यह सीधे तौर पर हिंदू अस्मिता और प्राचीन शिक्षा प्रणाली से जुड़ा मामला है।
