नई दिल्ली/वाशिंगटन: वैश्विक अर्थव्यवस्था के मंच पर भारत ने एक ऐसी छलांग लगाई है जिसने महाशक्ति अमेरिका की नींद उड़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ (आयात शुल्क) को दबाव के तौर पर इस्तेमाल करने की रणनीति पूरी तरह विफल रही है। इसके विपरीत, भारत ने ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ (EU-India FTA) के जरिए यह साबित कर दिया है कि व्यापारिक समझौतों के मामले में वह वाशिंगटन से कहीं आगे निकल चुका है।
वेदा पार्टनर्स का खुलासा: भारत ने अमेरिका को पीछे छोड़ा
वेदा पार्टनर्स की को-फाउंडर हेनरीटा ट्रेज ने सीएनबीसी (CNBC) को दिए एक हालिया साक्षात्कार में चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए हैं। ट्रेज के अनुसार, वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर भारी निराशा और हंगामा है कि भारत ने इस वर्ष डोनाल्ड ट्रंप की तुलना में 100% अधिक व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं।
ट्रेज ने कहा, “ट्रंप सरकार अपनी आक्रामक बयानबाजी को ठोस समझौतों में बदलने में नाकाम रही है। सरकार ने 90 दिनों में 90 समझौतों का वादा किया था, लेकिन हकीकत यह है कि पिछले 10 महीनों में अमेरिका केवल कंबोडिया और मलेशिया जैसे देशों के साथ दो छोटी डील ही कर पाया है।”
भारत-EU समझौता: ट्रंप के टैरिफ का करारा जवाब
भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुए हालिया मुक्त व्यापार समझौते (FTA) ने वैश्विक बाजार के समीकरण बदल दिए हैं। जहां ट्रंप ने भारत पर रूसी तेल खरीदने के कारण 50% तक टैरिफ लगा दिए थे, वहीं भारत ने अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों (यूरोपीय देशों) के साथ हाथ मिला लिया। इस समझौते से भारतीय कपड़ा, रत्न-आभूषण और इंजीनियरिंग सामानों के लिए यूरोप के दरवाजे खुल गए हैं, जो अमेरिकी टैरिफ से प्रभावित हुए थे।
क्यों फेल हुई ट्रंप की रणनीति?
विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप ने जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय संघ जैसे अपने खास पार्टनर्स पर टैरिफ का जो ‘डंडा’ चलाया, उसका उल्टा असर हुआ है।
- साझेदारों का मोहभंग: अमेरिकी दबाव के कारण सहयोगी देश अब वैकल्पिक बाजारों (जैसे भारत) की ओर देख रहे हैं।
- घरेलू विरोध: अमेरिका के भीतर भी 50% लोग इन टैरिफ के खिलाफ हैं, जिससे वहां की आर्थिक स्थिति और जटिल हो गई है।
- भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’: भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों और टैरिफ के आगे झुकने के बजाय अपने निर्यात बाजारों का विविधीकरण कर लिया।
