नई दिल्ली/मुंबई: भारत के विमानन क्षेत्र को प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा में आज एक मील का पत्थर स्थापित हुआ है। सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज तेल कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) और देश की सबसे तेजी से बढ़ती किफायती विमानन सेवा आकासा एयर ने सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) की खोज और आपूर्ति के लिए एक रणनीतिक समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस साझेदारी का मुख्य उद्देश्य विमानों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करना और भारत सरकार के ‘नेट-जीरो’ लक्ष्य को गति देना है।
क्या है SAF और क्यों है यह जरूरी?
सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) एक ऐसा वैकल्पिक ईंधन है जो पारंपरिक जेट ईंधन (ATF) की तुलना में कार्बन उत्सर्जन को 80% तक कम कर सकता है। यह ईंधन कृषि अवशेषों, उपयोग किए गए खाना पकाने के तेल (UCO) और ठोस कचरे से तैयार किया जाता है। चूंकि विमानन उद्योग वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में एक बड़ा हिस्सा रखता है, इसलिए SAF का उपयोग भविष्य की उड़ानों के लिए अनिवार्य माना जा रहा है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह डील?
इंडियन ऑयल और आकासा एयर के बीच हुआ यह समझौता केवल व्यावसायिक नहीं बल्कि पर्यावरण के प्रति एक बड़ी जिम्मेदारी भी है।
- कार्बन फुटप्रिंट में कमी: आकासा एयर अपने बेड़े में नए और आधुनिक विमानों का उपयोग करती है, और अब SAF के आने से ये विमान दुनिया के सबसे पर्यावरण अनुकूल विमानों में शामिल हो जाएंगे।
- आत्मनिर्भर भारत: इंडियन ऑयल स्वदेशी तकनीक से SAF के उत्पादन पर जोर दे रहा है, जिससे विदेशी तेल पर निर्भरता कम होगी।
- अंतरराष्ट्रीय मानक: यह समझौता वैश्विक विमानन मानकों के अनुरूप है, जो 2050 तक विमानन क्षेत्र को कार्बन-न्यूट्रल बनाने का लक्ष्य रखते हैं।
इंडियन ऑयल की भविष्य की तैयारी
इंडियन ऑयल के अधिकारियों के अनुसार, कंपनी हरियाणा के पानीपत रिफाइनरी में एक विशेष SAF प्लांट स्थापित करने पर काम कर रही है। आकासा एयर के साथ यह साझेदारी कंपनी को एक बड़ा बाजार और परीक्षण का आधार प्रदान करेगी। आकासा एयर के संस्थापक और सीईओ विनय दुबे ने इस मौके पर कहा, “हम पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते हैं। इंडियन ऑयल के साथ यह गठबंधन हमें और अधिक स्थायी तरीके से संचालन करने में मदद करेगा।”
विमानन क्षेत्र में नई प्रतिस्पर्धा
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते के बाद इंडिगो और एयर इंडिया जैसी अन्य बड़ी एयरलाइंस पर भी SAF को अपनाने का दबाव बढ़ेगा। इससे भारत में हरित ईंधन के बाजार में तेजी आएगी और नई तकनीकों के लिए निवेश के द्वार खुलेंगे।
