ढाका: दक्षिण एशियाई पड़ोसी देश बांग्लादेश में लोकतंत्र का पर्व ‘चुनाव’ करीब है, लेकिन यहाँ का अल्पसंख्यक समुदाय—विशेषकर हिंदू, ईसाई और बौद्ध—इस समय सबसे गहरे डर और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। आगामी 12 फरवरी को होने वाले राष्ट्रीय चुनावों से पहले आई एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने बांग्लादेश के सामाजिक ताने-बाने पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में बढ़ती कट्टरता और मौजूदा राजनीतिक शून्यता के कारण अल्पसंख्यक समुदाय खुद को पूरी तरह असुरक्षित महसूस कर रहा है।
कट्टरपंथियों का बढ़ता हौसला और सरकार की उदासीनता
‘मिशन नेटवर्क न्यूज’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, फॉरगॉटन मिशनरीज इंटरनेशनल (FMI) के ब्रूस एलन ने बताया कि बांग्लादेश का माहौल इस समय ‘अराजकता’ की ओर बढ़ रहा है। नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली कार्यवाहक सरकार के दौरान कट्टरपंथी समूहों की गतिविधियों में तेजी आई है। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि प्रशासन इन उग्रवादी तत्वों के प्रति उदासीन रवैया अपनाए हुए है, जिससे उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ी हैं।
ब्रूस एलन ने चेतावनी देते हुए कहा, “हालात पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गए हैं। कट्टरपंथी मुसलमान मौजूदा अराजकता का फायदा उठाकर सक्रिय हो रहे हैं, जिससे चर्चों और मंदिरों के संचालकों को गंभीर जान-माल का खतरा पैदा हो गया है।”
ज़मीनी विवाद और धार्मिक स्थलों पर हमला
रिपोर्ट में एक विशेष मामले का जिक्र करते हुए बताया गया कि कैसे ढाका और आसपास के इलाकों में अल्पसंख्यकों की संपत्तियों पर कब्जा करने की कोशिश की जा रही है। एक पादरी ‘मिंटू’ का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट बताती है कि मुस्लिम पड़ोसियों के हिंसक विरोध के कारण एक चर्च का निर्माण पिछले डेढ़ साल से बंद पड़ा है।
अल्पसंख्यक समुदाय के पास न तो अपनी ज़मीन के पक्के कागज़ात हैं और न ही उन्हें सरकारी संरक्षण मिल रहा है। अधिकांश ईसाई और हिंदू ऐसे भूखंडों पर रह रहे हैं जिनका मालिकाना हक अस्पष्ट है, जिसका फायदा उठाकर कट्टरपंथी उन्हें बेदखल करने की धमकी दे रहे हैं।
राजनीतिक समीकरण: जेनरेशन-जेड और कट्टरपंथियों का गठजोड़?
बांग्लादेश की राजनीति में एक नया और चिंताजनक मोड़ तब आया जब ‘जेनरेशन-जेड’ (Gen-Z) के छात्र आंदोलनों का झुकाव विवादित कट्टरपंथी संगठनों की ओर देखा गया। नेशनल सिटिजन पार्टी द्वारा जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन करने की खबरों ने अल्पसंख्यकों के मन में डर को और पुख्ता कर दिया है। जमात-ए-इस्लामी का इतिहास अल्पसंख्यकों के प्रति हिंसक रहा है, ऐसे में यह नया राजनीतिक समीकरण भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं दे रहा है।
महंगाई और गुस्से का दोहरा प्रहार
असुरक्षा के साथ-साथ बांग्लादेश इस समय भीषण आर्थिक संकट और महंगाई से भी जूझ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती कीमतों ने आम जनता में गुस्सा भर दिया है, जिसका निशाना अक्सर कमजोर अल्पसंख्यक समुदायों को बनाया जा रहा है। ब्रूस एलन के शब्दों में, “जब समाज में गुस्सा और अराजकता होती है, तो सबसे पहले अल्पसंख्यक ही उसकी भेंट चढ़ते हैं।”
