कानपुर। जहां आज के दौर में कंक्रीट के जंगल बढ़ रहे हैं, वहीं कानपुर नगर के भीतरगांव विकास खंड का एक छोटा सा गांव ‘बिरहर’ पूरी दुनिया को पर्यावरण संरक्षण का पाठ पढ़ा रहा है। यहाँ करीब 20 बीघे में फैला एक विशाल बगीचा इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। यह बगीचा न केवल आंखों को सुकून देता है, बल्कि यहाँ शुरू हुई ‘वृक्ष गोद लेने की परंपरा’ ने इसे एक तीर्थ स्थल जैसा सम्मान दिला दिया है।
20 बीघे में फैला ‘हरित लोक’: बंजर से बाग तक का सफर
इस बगीचे को तैयार करने का श्रेय गांव के ही दो प्रगतिशील भाइयों, हरी मिश्र और ओम मिश्र को जाता है। वर्षों पहले जिस भूमि को लोग बंजर मानकर छोड़ चुके थे, उसे अपनी मेहनत और पसीने से इन दोनों भाइयों ने एक सघन वन में तब्दील कर दिया। आज यहाँ आम, अमरूद, नीम, पीपल, जामुन और बरगद जैसे सैकड़ों फलदार व छायादार वृक्ष लहलहा रहे हैं।
‘वृक्ष गोद लो’ अभियान: प्रकृति से जुड़ने का अनोखा तरीका
इस बगीचे की सबसे बड़ी खासियत यहाँ का ‘एडॉप्शन मॉडल’ है। यहाँ आने वाले लोग केवल घूमते ही नहीं, बल्कि एक पौधे को अपना ‘बच्चा’ मानकर उसे गोद लेते हैं।
- गोद लेने का मतलब: जो व्यक्ति पेड़ गोद लेता है, वह उसके नाम की पट्टिका लगवाता है और उसके खाद-पानी व सुरक्षा का संकल्प लेता है।
- संदेश: इस पहल का उद्देश्य लोगों को केवल पेड़ लगाने तक सीमित न रखकर, उनके बड़े होने तक जिम्मेदारी निभाने का अहसास कराना है।
प्रशासनिक अमले ने भी थपथपाई पीठ
इस बगीचे की ख्याति जब शहर तक पहुँची, तो कानपुर के पूर्व जिलाधिकारी विशाख जी, घाटमपुर एसडीएम और नरवल एसडीएम भी निरीक्षण करने बिरहर गांव पहुँचे। अधिकारियों ने बगीचे की सघनता और मिश्र भाइयों के प्रबंधन को देखकर दांतों तले उंगली दबा ली।
पूर्व डीएम ने निरीक्षण के दौरान कहा— “पर्यावरण संरक्षण आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। हरी और ओम मिश्र ने यह साबित कर दिया है कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो बंजर जमीन से भी सोना उगाया जा सकता है। यह मॉडल पूरे जिले में लागू होना चाहिए।”
आने वाली पीढ़ियों के लिए ‘विरासत’
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि इस बगीचे के कारण गांव का जलस्तर भी सुधरा है। हरी मिश्र बताते हैं कि उनका लक्ष्य इस बगीचे को एक ‘नेचर लर्निंग सेंटर’ के रूप में विकसित करना है, जहाँ स्कूली बच्चे आएं और मिट्टी व पौधों से जुड़ना सीखें। ओम मिश्र कहते हैं— “हमने पेड़ नहीं, अपनी सांसें बोई हैं।”
