रिन्यूएबल्स ने नहीं बढ़ाया बिजली बिल: डेटा ने खोली ‘डर की राजनीति’ की पोल – NewsKranti

रिन्यूएबल्स ने नहीं बढ़ाया बिजली बिल: डेटा ने खोली ‘डर की राजनीति’ की पोल

नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर फैलाए जा रहे डर के विपरीत, वैश्विक डेटा बताता है कि सोलर और विंड एनर्जी अपनाने वाले क्षेत्रों में बिजली की दरें कम हुई हैं।

admin
By
admin
3 Min Read
Highlights
  • लागत में गिरावट: सौर और पवन ऊर्जा अब उत्पादन के सबसे सस्ते स्रोत हैं।
  • उपभोक्ताओं की बचत: यूरोप में रिन्यूएबल्स के कारण 100 अरब यूरो की बचत हुई।
  • भारत का मौका: रिन्यूएबल्स अपनाने से राज्यों की बिजली खरीद लागत 11% तक गिर सकती है।
  • बैटरी स्टोरेज: गिरती लागत के साथ अब 'बैकअप' की समस्या का भी सस्ता समाधान मौजूद है।

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि सौर और पवन ऊर्जा ‘अस्थिर’ हैं और इनके बैकअप के चक्कर में आम जनता का बिजली बिल बढ़ जाता है। लेकिन दिसंबर 2025 में आई ‘ज़ीरो कार्बन एनालिटिक्स’ की एक विस्तृत रिपोर्ट ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। ऊर्जा विश्लेषक निक हेडली द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और भारत के वास्तविक बाज़ार आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है, जो साबित करता है कि रिन्यूएबल्स बिजली को महँगा नहीं, बल्कि सस्ता बना रहे हैं।

वैश्विक बाज़ार: कोयले से सस्ती हुई ‘हवा और धूप’

इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में बिजली उत्पादन का सबसे किफायती जरिया ऑनशोर विंड और सोलर पीवी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में ग्रिड से जुड़ी 90% रिन्यूएबल परियोजनाएं, सबसे सस्ते जीवाश्म ईंधन (कोयला/गैस) की तुलना में भी कम लागत पर बिजली पैदा कर रही थीं।

अमेरिका और यूरोप: जहाँ रिन्यूएबल्स ज़्यादा, वहाँ दरें कम

रिपोर्ट में अमेरिका के आयोवा, साउथ डकोटा और न्यू मैक्सिको जैसे राज्यों का उदाहरण दिया गया है, जहाँ 50% से अधिक बिजली रिन्यूएबल्स से आती है। यहाँ बिजली की दरें अमेरिकी राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे दर्ज की गईं।

- Advertisement -

यूरोप में भी यही स्थिति है। स्पेन में 2025 की पहली छमाही में बिजली के दाम यूरोपीय औसत से 32% कम रहे। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी का अनुमान है कि 2021 से 2023 के बीच नई सोलर और विंड क्षमता ने यूरोपीय उपभोक्ताओं के करीब 100 अरब यूरो बचाए हैं।

भारत के लिए संकेत: राजस्थान और मध्य प्रदेश ने दिखाई राह

भारत में हालाँकि अभी भी 75% बिजली कोयले से बनती है, लेकिन जिन राज्यों ने रिन्यूएबल्स में निवेश किया है, वहां सकारात्मक परिणाम दिख रहे हैं:

  • राजस्थान: यहाँ डिस्कॉम्स द्वारा बिजली खरीद की औसत कीमत राष्ट्रीय स्तर से कम है।
  • मध्य प्रदेश: एक अध्ययन के अनुसार, रिन्यूएबल्स की हिस्सेदारी बढ़ने से बिजली खरीद लागत में 11% तक की कमी संभव है।

महँगी बिजली का असली गुनहगार कौन?

रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि कैलिफोर्निया या ऑस्ट्रेलिया जैसे कुछ क्षेत्रों में अगर कीमतें अधिक हैं, तो उसकी वजह रिन्यूएबल्स नहीं बल्कि:

  • पुराने ग्रिड को अपग्रेड करने का खर्च।
  • जंगलों की आग जैसी प्राकृतिक आपदाओं से जुड़ी लागत।
  • आयातित महँगी गैस और कोयले पर निर्भरता।

निष्कर्ष: राजनीति बनाम हकीकत

ऊर्जा विश्लेषक निक हेडली के अनुसार, सवाल अब यह नहीं है कि रिन्यूएबल्स महँगे हैं या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या हम अस्थिर जीवाश्म ईंधन की मार झेलते रहना चाहते हैं? डेटा साफ है—भविष्य सस्ती, साफ़ और सुरक्षित रिन्यूएबल ऊर्जा का ही है।

Share This Article