प्रयागराज। नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को अवैध रूप से हिरासत में रखे गए व्यक्ति को 2 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि किसी भी व्यक्ति को कानून में निर्धारित प्रक्रिया के बिना हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 का गंभीर उल्लंघन है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि संबंधित व्यक्ति को पुलिस द्वारा कई दिनों तक हिरासत में रखा गया, जबकि उसे समय पर न्यायालय के समक्ष पेश नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि पुलिस को कानून से ऊपर मानने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक है।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है और राज्य की एजेंसियों का दायित्व है कि वे कानून का पूर्ण पालन करें। यदि किसी व्यक्ति के अधिकारों का हनन होता है तो राज्य उसकी भरपाई करने के लिए उत्तरदायी होगा।
हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि पीड़ित को दो लाख रुपये की क्षतिपूर्ति निर्धारित समय सीमा के भीतर उपलब्ध कराई जाए। साथ ही अदालत ने संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता बताई।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला नागरिक अधिकारों की सुरक्षा और पुलिस जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अदालत का यह आदेश स्पष्ट संदेश देता है कि कानून के शासन में किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ मनमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर चोट बर्दाश्त नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
