कानपुर KDA घोटाला: ₹90 करोड़ का भ्रष्टाचार उजागर करने वाले दलित

केडीए के ₹90 करोड़ के घोटाले को उजागर करने वाले दलित कर्मचारी की बर्खास्तगी पर उठे सवाल

केडीए कानपुर में करोड़ों की वसूली का मामला गरमाया। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले अनुसूचित जाति के कर्मचारी की बर्खास्तगी ने योगी सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' नीति पर सवाल खड़े किए हैं।

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ख़बर एक नज़र में :
  • घोटाला: केडीए में ₹90.88 करोड़ की वसूली को रोकने की साजिश।
  • व्हिसलब्लोअर: प्रगतिशील कर्मचारी संघ के अध्यक्ष राकेश रावत ने किया खुलासा।
  • कार्रवाई: भ्रष्टाचार उजागर करने पर रावत को किया गया सेवा से बर्खास्त।
  • प्रमाण: शिकायत के बाद 27 फरवरी 2026 को सरकारी खजाने में जमा हुई राशि।
  • मांग: दोषी अधिकारियों पर केस और कर्मचारी की बहाली।

कानपुर। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जहाँ एक ओर भ्रष्टाचार के विरुद्ध ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का डंका पीट रही है, वहीं कानपुर विकास प्राधिकरण (KDA) से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक शुचिता के दावों की पोल खोल दी है। केडीए में व्याप्त करोड़ों के वित्तीय खेल को उजागर करने वाले प्रगतिशील कर्मचारी संघ के अध्यक्ष और अनुसूचित जाति के कर्मचारी राकेश रावत को इनाम के बदले ‘बर्खास्तगी’ का दंश झेलना पड़ रहा है।

क्या है ₹90.88 करोड़ का सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल घोटाला?

मामला ब्लॉक एच, फैक्ट्री वर्क एरिया, जूही स्थित एक सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के भूखंड से जुड़ा है। आरोप है कि केडीए के तत्कालीन रसूखदार अधिकारियों ने सांठगांठ कर विभाग को देय ₹90,88,56,667 की भारी-भरकम राशि को माफ करने या डकारने की साजिश रची थी।

जब विभाग के ही कर्मचारी राकेश रावत ने इस करोड़ों की राजस्व हानि के विरुद्ध मोर्चा खोला और शासन स्तर तक शिकायतें भेजीं, तो केडीए के भीतर हड़कंप मच गया।

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सत्ता का दुरुपयोग: आवाज दबाने के लिए रची गई साजिश

राकेश रावत का आरोप है कि तत्कालीन उपाध्यक्ष अरविंद सिंह और तत्कालीन सचिव शत्रोहन वैश्य ने अपने काले कारनामों को छिपाने के लिए उन पर दमनात्मक कार्रवाई की। रावत के अनुसार:

  1. फर्जी दस्तावेज: ‘दि लायर्स एसोसिएशन कानपुर’ के लेटर पैड का फर्जी इस्तेमाल कर उन पर झूठे आरोप मढ़े गए।
  2. एकतरफा जांच: बिना किसी निष्पक्ष सुनवाई के उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
  3. कानूनी उल्लंघन: यह कार्रवाई न केवल सेवा नियमावली बल्कि SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 का भी खुला उल्लंघन है।

सच्चाई की जीत: खजाने में जमा हुए ₹90 करोड़

राकेश रावत की लड़ाई तब सही साबित हुई जब उनके निरंतर संघर्ष और मुख्यमंत्री पोर्टल पर की गई शिकायतों के दबाव में, अंततः 27 फरवरी 2026 को संबंधित पक्ष द्वारा ₹90.88 करोड़ की लंबित राशि सरकारी खजाने में जमा कराई गई। यह वसूली इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि रावत द्वारा उठाए गए भ्रष्टाचार के आरोप शत-प्रतिशत सही थे।

“भ्रष्टाचारी चैन की नींद सो रहे, पीड़ित परिवार सड़क पर”

अपनी व्यथा सुनाते हुए राकेश रावत कहते हैं, “आज भ्रष्टाचार उजागर करने के कारण मेरा परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से टूट चुका है। जिन अधिकारियों ने घोटाला करने की कोशिश की, वे आज भी ऊंचे पदों पर आसीन हैं और चैन की नींद सो रहे हैं, जबकि एक दलित कर्मचारी को सच बोलने की सजा दी गई है।”

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